हल्दीरामपुर-छपिया अग्निकांड: अब पहचान और पुनर्निर्माण की चुनौती
युवा तुर्क, बेल्थरा रोड (बलिया)
हल्दीरामपुर-छपिया गांव में शनिवार को हुए भीषण अग्निकांड के बाद रविवार को हालात सिर्फ राहत के नहीं, बल्कि पुनर्वास और पहचान के संकट में बदलते नजर आए। आग बुझ चुकी है, लेकिन गांव अब एक नई लड़ाई लड़ रहा है—अपने अस्तित्व को फिर से खड़ा करने की।

करीब 60 से अधिक घरों और मड़हों के जलने के बाद 70 से ज्यादा परिवार बेघर हैं। रविवार की सुबह गांव किसी आपदा क्षेत्र जैसा दिखा—चारों ओर राख, जले बर्तन, मुड़े-तुड़े टिन और बिखरे सपनों के अवशेष। लेकिन इस तबाही के बीच सबसे बड़ी समस्या अब सिर पर छत नहीं, बल्कि “पहचान” की बन गई है।
दरअसल, आग में न सिर्फ घर जले, बल्कि बैंक पासबुक, आधार कार्ड, राशन कार्ड जैसे जरूरी दस्तावेज भी खाक हो गए। ऐसे में शासन द्वारा घोषित सहायता राशि तक पहुंचना भी पीड़ितों के लिए मुश्किल होता जा रहा है। लेखपाल राजीव गिरी के मुताबिक करीब 40 घर और 73 परिवार प्रभावित हुए हैं, लेकिन दस्तावेजों के अभाव में राहत प्रक्रिया अटक सकती है।

रविवार की रात इन परिवारों ने खुले आसमान के नीचे गुजारी। न टेंट, न तिरपाल सिर्फ जमीन और आसमान के बीच जिंदगी को समेटे लोग। सुबह होते ही महिलाओं का दर्द फूट पड़ा। कोई राख में बर्तन खोज रही थी, तो कोई जले कपड़ों के बीच बच्चों के लिए कुछ बचा हुआ तलाश रही थी।

इस त्रासदी ने कई घरों की खुशियां भी निगल लीं। विक्रम राजभर की बेटी प्रियंका की 25 जून को शादी होनी थी, लेकिन शादी का पूरा सामान और एक लाख रुपये नकद आग में जल गए। रविवार को उसकी मां का विलाप गांव के दर्द की सबसे मार्मिक तस्वीर बनकर सामने आया।
स्वास्थ्य संकट भी कम नहीं है। बेचन (55) और उसकी पुत्री कंचन (25) गंभीर रूप से झुलस गए हैं, जिनका इलाज हायर सेंटर में चल रहा है। कंचन की हालत चिंताजनक बताई जा रही है। वहीं, कई मवेशियों के जलने से ग्रामीणों की आजीविका पर भी सीधा असर पड़ा है।
हालांकि इस आपदा में सरकारी मदद सीमित दिखी, लेकिन गांव की एकजुटता ने उम्मीद की लौ जलाए रखी है। रविवार को भी ग्रामीणों ने मिलकर खिचड़ी बनाकर बच्चों और बुजुर्गों को खिलाया। गांव के रमेश मास्टर ने दो बोरा गेहूं देने की घोषणा की, जबकि अन्य लोग भी अपने-अपने स्तर पर सहयोग कर रहे हैं।
रविवार को पूर्व विधायक गोरख पासवान ने गांव पहुंचकर पीड़ितों से मुलाकात की और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया। शनिवार को पूर्व विधायक धन्नजय कन्नौजिया भी मौके पर मौजूद रहे। वहीं ग्रामीणों का कहना है कि अगर तत्काल लकड़ी, फूस और डोढ़ की व्यवस्था हो जाए, तो वे खुद ही अपने आशियाने दोबारा खड़े करने की शुरुआत कर सकते हैं।
गौरतलब है कि शनिवार को लगी आग ने करीब तीन घंटे तक गांव में तांडव मचाया था। तेज हवा के चलते आग तेजी से फैल गई और दर्जनों घर इसकी चपेट में आ गए। दमकल की टीम देर से पहुंची, लेकिन स्थानीय लोगों और पानी के टैंकरों की मदद से आग पर काबू पाया गया।
अब सवाल सिर्फ राहत का नहीं, बल्कि पुनर्निर्माण का है। हल्दीरामपुर-छपिया के लोग आज सिर्फ अपने घर नहीं, बल्कि अपनी पहचान, अपने सपनों और अपने भविष्य को फिर से खड़ा करने की जद्दोजहद में जुटे हैं। रविवार को दूसरे दिन भी घटना स्थल का निरीक्षण करने पहुंचे उपजिलाधिकारी शरद चौधरी ने बताया कि वह डॉक्टर व नर्सेज की टीम लेके गए थे। इस दौरान उनके द्वारा पीड़ितों के लिए 5 कुंतल चावल, 50 किलो दाल व 10 दर्जन केले मुहैया कराया गया।
सांसद ने राहत सामग्री वितरित की:
रविवार की अपराह्न हल्दीरामपुर-छपिया पहुंचे सांसद रमाशंकर राजभर ने अग्निकांड से प्रभावित परिवारों का हाल जाना। इस दौरान उन्होंने प्रशासन से पीड़ितों को समुचित सरकारी सहायता उपलब्ध कराने की मांग की।
सांसद ने राहत कार्य के तहत 50 प्रभावित परिवारों को तिरपाल वितरित किया, ताकि उनके रहने की अस्थायी व्यवस्था हो सके। साथ ही प्रत्येक परिवार को भोजन सामग्री के रूप में आधा-आधा किलो सोयाबीन, आधा-आधा लीटर सरसों का तेल, नमक व मसाला दिया गया। इसके अतिरिक्त सामूहिक उपयोग के लिए तीन कुंतल आलू और दो कुंतल प्याज भी वितरित किया गया। इस दौरान उनके साथ सपा के प्रदेश सचिव आद्या शंकर यादव भी मौजूद रहे।
उन्होंने भरोसा दिलाया कि पीड़ित परिवारों को हर संभव सहायता दिलाने के लिए वे प्रशासन के साथ लगातार संपर्क में हैं।
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