डीएम के हाथ में है ‘मास्टर की’, नहीं चलेगी मनमर्जी
केके वर्मा, लखनऊ
प्रदेश में ग्राम पंचायतों को लेकर राज्य सरकार के फैसले ने निवर्तमान ग्राम प्रधान जी की धड़कन बढ़ा दी हैं। प्रधान जी प्रशासक तो बन गए, लेकिन अब असली चाभी कलेक्टर साहब के पास रहेगी। बगैर डीएम के परमिशन के प्रधान जी कोई नया काम नहीं कर पायेंगे।
बता दें कि ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद योगी सरकार ने उन्हें ही प्रशासक के रूप में नियुक्त कर दिया है। सरकार के इस फैसले से प्रधान जी बेहद खुश थे, किंतु नए फरमान ने ग्राम प्रधानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच दी है।
अब प्रधानजी की मनमर्ज़ी नहीं चलेगी। अब पंचायती राज विभाग ने कड़े और नए दिशा-निर्देश जारी किये हैं। नए नियमों के आते ही प्रधानों का उत्साह चिंता में बदल गया है। नए शासनादेश के तहत प्रधान जी अपनी मर्जी से कोई भी नया विकास कार्य शुरू नहीं कर पाएंगे और न ही पंचायत के फंड से नया पैसा खर्च कर सकेंगे।
अगर जरूरी है तो जिले के मुखिया यानि डीएम की हरी झंडी चाहिए। नए फैसले ने ग्राम प्रधानों के अधिकारों पर लगाम लगा दी है। प्रशासक बने प्रधान उन्हीं पुराने और पहले से चल रहे विकास कार्यों का भुगतान कर सकेंगे जो पहले से स्वीकृत हैं।
अगर गांव में कोई नई योजना शुरू करनी हो, किसी भी प्रकार की सरकारी खरीद करनी हो या फिर कोई नया निर्माण कार्य हाथ में लेना हो तो डीएम की लिखित अनुमति अनिवार्य है।
ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो गया था और 27 मई से निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी। प्रधानों को लगा था कि पंचायतों का काम पहले की तरह ठाट-बाट से चलेगा लेकिन पंचायती राज विभाग के नए आदेश ने खेल पलट दिया है।
प्रशासक पहले से स्वीकृत, निर्माणाधीन या पूर्ण हो चुके कार्यों का भुगतान करा सकेंगे। नए काम के लिए प्रस्ताव तैयार कर डीपीआरओ के माध्यम से डीएम के पास भेजना होगा। डीएम की अनुमति के बाद ही काम शुरू होगा। अर्थात अब गांव में खड़ंजा, नाली, इंटरलॉकिंग, हैंडपंप या अन्य कोई नया काम प्रधान जी की मर्जी से नहीं, बल्कि कलेक्टर के आदेश से होगा। जरूरत पड़ी तो प्रस्तावित कार्यों की जांच भी होगी।
प्रशासक के पद पर रहते हुए प्रधान कोई भी नीतिगत निर्णय नहीं ले सकेंगे। यदि गांव में कोई विशेष या बेहद जरूरी मामला सामने आता है तो उसकी फाइल डीपीआरओ के जरिए डीएम को भेजी जाएगी।
राज्य सरकार ने यह व्यवस्था इसलिए लागू की है ताकि आने वाले पंचायत चुनावों से पहले सरकारी फंड का दुरुपयोग न हो सके और प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता बनी रहे। सरकार के इस कड़े कदम से यह साफ हो गया है कि अब प्रशासक बने प्रधान जी बिना डीएम की अनुमति के एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा पाएंगे। अब गांव की सरकार की असली चाबी सीधे डीएम के हाथ में पहुंच गई है।
प्रधानों को उम्मीद थी कि प्रशासक बनने के बाद भी उनके जलवे और अधिकार पहले जैसे ही रहेंगे, लेकिन अब उन्हें छोटे से छोटे नए काम के लिए भी सरकारी दफ्तरों की चौखट पर चक्कर काटने पड़ेंगे। डीएम की संस्तुति और जांच-परख के बाद ही गांवों में कोई भी नया कार्य शुरू कराया जा सकेगा।
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