डॉ भारती ने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा विद्यालय पर खर्च किया
युवा तुर्क, मऊ
यह भीड़ किसी सांसद, विधायक या बड़े राजनीतिक पद पर बैठे व्यक्ति की अंतिम यात्रा की नहीं थी। यह उस शिक्षक की अंतिम विदाई थी, जिसने पूरी जिंदगी ईमानदारी, निष्ठा और शिक्षा के प्रति समर्पण के साथ काम किया। घोसी निवासी शिक्षक डॉ. रामविलास भारती का शव जब पैतृक गांव माछिल (जमीन माछिल) पहुंचा तो अंतिम दर्शन के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। अंतिम यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए। नम आंखों से लोगों ने अपने प्रिय शिक्षक को अंतिम विदाई दी।


दिल्ली में प्रशिक्षण के दौरान हृदयाघात से डॉ. रामविलास भारती के असमय निधन की खबर ने मऊ के शिक्षा जगत को झकझोर दिया था। लेकिन उनके अंतिम दर्शन और अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ ने यह भी दिखा दिया कि किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके पद या प्रचार से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से बनती है।

डॉ. रामविलास भारती शिक्षा को महज नौकरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी मानकर निभाते थे। विद्यालय के विकास के लिए उन्होंने केवल विभागीय संसाधनों का इंतजार नहीं किया, बल्कि अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा भी विद्यालय पर खर्च किया। अपने निजी प्रयासों से विद्यालय में समृद्ध पुस्तकालय स्थापित कराने के साथ परिसर को बेहतर और विद्यार्थियों के लिए सुविधाजनक बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें राज्यपाल और मुख्यमंत्री स्तर से राज्य स्तरीय सम्मान भी प्राप्त हो चुका था। उनकी ईमानदारी, सरलता, विनम्र व्यवहार और कार्यशैली ने उन्हें विद्यार्थियों, शिक्षकों और समाज के बीच अलग पहचान दिलाई। यही वजह रही कि उनके निधन की खबर के बाद से ही क्षेत्र में शोक का माहौल बना रहा।
माछिल से दोहरीघाट तक उमड़ा जनसैलाब
डॉ. रामविलास भारती की अंतिम यात्रा उनके पैतृक गांव माछिल (जमीन माछिल) से शुरू हुई। यात्रा रघौली, मझवारा मोड़, घोसी, जूनियर हाईस्कूल धरौली, थानीदास और गोठा होते हुए दोहरीघाट मुक्तिधाम पहुंची। यात्रा मार्ग में जगह-जगह लोगों ने रुककर अपने प्रिय शिक्षक को अंतिम विदाई दी।
कई स्थानों पर बच्चे कतारबद्ध होकर खड़े रहे। क्षेत्र के लोगों ने नम आंखों से अंतिम दर्शन किया और श्रद्धांजलि अर्पित की। अंतिम यात्रा में शिक्षकों, विद्यार्थियों, अभिभावकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बड़ी संख्या में आम लोगों की मौजूदगी रही।
किसी शिक्षक के लिए इससे बड़ा सम्मान शायद ही कुछ और हो कि उसके पढ़ाए विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि पूरा समाज उसे अंतिम विदाई देने उमड़ पड़े। डॉ. रामविलास भारती ने अपने जीवन में जिस तरह शिक्षा, ईमानदारी और समाज के प्रति जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी, उनकी अंतिम यात्रा उसी का प्रतिबिंब बन गई।
सत्य, निष्ठा और ईमानदारी से काम किया जाए तो व्यक्ति से व्यक्तित्व बनता है। डॉ. रामविलास भारती का जीवन इसी बात की मिसाल बनकर सामने आया। उनकी अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब बता गया कि एक सच्चे शिक्षक की जगह केवल विद्यालय में नहीं, बल्कि अपने विद्यार्थियों और समाज के दिलों में भी होती है।


