काकोरी ट्रेन एक्शन के शताब्दी वर्ष के समापन व ‘भारत छोडो आन्दोलन’ की बरसी पर शहीदों को दी गई श्रद्धांजलि
युवा तुर्क, लखनऊ
पीपुल्स यूनिटी फोरम, लखनऊ व प्रबुद्ध जन परिषद, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में काकोरी ट्रेन एक्शन के शताब्दी वर्ष के समापन व भारत छोडो आन्दोलन की बरसी के अवसर पर स्मृति सभा का आयोजन जीपीओ पार्क स्थित काकोरी शहीद स्मृति स्तम्भ स्थल पर किया गया। स्मृति सभा की अध्यक्षता समाजवादी नेता व प्रबुद्ध जन परिषद, लखनऊ के संयोजक विजय श्रीवास्तव ने व संचालन पीपुल्स यूनिटी फोरम, लखनऊ के संयोजक वीरेन्द्र त्रिपाठी ने किया। स्मृति सभा में शहीदों व स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष व शहादत के प्रतीक शहीद स्तम्भ पर पुष्पांजलि कर उनके जीवन संघर्ष को याद किया गया।
वक्ताओं ने कहा कि 9 अगस्त 1925 को काकोरी लखनऊ में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारियों ने जो कदम उठाया था, वह केवल एक ट्रेन से सरकारी खजाना लूटना नहीं, बल्कि देश की आज़ादी के लिए विदेशी दासता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए क्रांतिकारियों के महासंकल्प का उद्घोष था।
आजाद भारत में गरीब-अमीर का कोई भेदभाव ना रहे, कोई रोटी के लिए ना तरसे, स्त्री-पुरुष बिना किसी भेदभाव के सम्मान के साथ मर्यादापूर्ण जीवन जियें, ऐसे एक शोषणहीन समाज की स्थापना का सपना हमारे इन शहीदों ने देखा था और उसी के लिए संघर्ष करते हुए शहादत दे गए। बिस्मिल और अशफ़ाक़ दोनों ही अपने-अपने धर्म को मानते थे। एक थे आर्य समाजी और दूसरे मुसलमान, लेकिन धीरे-धीरे वे समझ गए थे कि धर्म व्यक्ति का निजी मामला है। उन्होंने धर्म को आज़ादी आंदोलन की राह में कभी भी रोड़ा नहीं बनने दिया था।
अपनी आत्मकथा में बिस्मिल ने लिखा, ‘अंग्रेज चाहते हैं कि हिंदू-मुस्लिम झगड़ों का फायदा उठाओ और भारतवर्ष की गुलामी की जंजीरें और कस दो।’
अशफ़ाक़ ने कहा, “मुल्क का सवाल मज़हबी भेदभाव से कहीं ऊँची चीज है। मेरा दिल खुला हुआ है, एक मुसलमान के लिए भी वैसा ही जैसा कि एक हिन्दू के लिए।”
बिस्मिल-अशफ़ाक़ की दोस्ती से सीख लेकर वर्तमान पीढ़ी सांप्रदायिक सौहार्द को मज़बूत करने और सांप्रादायिक ताकतों से समाज को सुरक्षित करने के दायित्व को पूरा करने की प्रेरणा लेती रहेगी।
वक्ताओं ने कहा कि यह दिन हमें 1942 में शुरू हुए ऐतिहासिक भारत छोड़ो आंदोलन की भी याद दिलाता है, जब महात्मा गांधी के आह्वान पर देशवासियों ने अंग्रेजों को भारत से भगाने का अंतिम संकल्प लिया था।
स्मृति सभा में सामाजवादी चिंतक ओंकार सिंह, असगर मेंहदी, जय प्रकाश, प्रभात कुमार, देवेंद्र वर्मा, टीनू, विजय श्रीवास्तव, एके श्रीवास्तव, एडवोकेट वीरेंद्र त्रिपाठी, अमोद कुमार, सुहैल, फरजान हैदर, राफे खान सहित अन्य वरिष्ठ जनों ने शहीदों को याद किया और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
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