दिल्ली देहात की राजनीति के एक युग का हुआ अंत
यदि सिखों के कत्लेआम का कलंक नहीं लगा होता तो देश की राजनीति में बहुत ऊपर जाते सज्जन कुमार
आनंद राणा, नई दिल्ली
तिहाड़ जेल में बंद कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार का गुरुवार को 80 साल की उम्र में निधन हो गया। सज्जन कुमार दिसंबर 2018 से जेल में बंद थे। उन्हें 1984 में सिख विरोधी दंगों के मामले में उम्र कैद की सजा मिली थी।
सज्जन कुमार लगभग सारी जिंदगी ही विवादों से घिरे रहे। उम्र कैद की सजा काटने के लिए जब वे जेल गए तब जाकर उन्होंने राजनीतिक संघर्षों और अदालती भागदौड़ से निजात पायी। वरना तो वे कभी ठहरे नहीं।
अगर सिखों के कत्लेआम का कलंक उनके माथे नहीं लगा होता तो वे दिल्ली और देश की राजनीति में बहुत ऊपर जाते।
1980 में वे पहली बार सांसद बने। 1991 में जब साहिब सिंह वर्मा ने दिल्ली देहात या कहें बाहरी दिल्ली लोकसभा सीट पर ताल ठोंकी तो सज्जन कुमार सामने थे। तब इसे दो शेरों की टक्कर माना गया था। फिर इसके बाद दिल्ली देहात में चुनाव चाहे नगर निगम का रहा हो, विधानसभा का या फिर लोकसभा का इसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर सज्जन और साहिब सिंह के बीच मुकाबला माना जाता रहा।
2007 में साहिब सिंह और आज सज्जन कुमार के दुनिया से जाने के बाद ये कहना सही ही होगा कि दिल्ली देहात की राजनीति पर एकछत्र राज करने वालों का युग समाप्त हो गया।
सज्जन कुमार को दिल्ली के खांटी जाटों ने जाट मानने में हमेशा आनाकानी ही की। उनको झुग्गी झोपड़ी वालों का नेता कह कर बहुत बार खारिज करने की कोशिशें हुईं।
पर जानने वाले जानते हैं कि सज्जन की बाहरी दिल्ली के गांवों में भी जबरदस्त पैठ थी। हर गांव में उनका एक दो घरों में ही आना जाना रहता था पर वे घर गांव की वोटों पर असर रखने वाले होते थे। जबकि साहिब सिंह वर्मा इस मामले में सज्जन के उलट गांव के ज्यादा से ज्यादा लोगों को गले लगाने की कोशिश करते थे। वर्मा जी जिक्र आने पर कई बार कहते थे 91 के लोकसभा चुनाव में सज्जन कुमार ने भले चुनाव जीता, पर मैंने लोगों के दिल जीते।
संजय गांधी से सज्जन की जान पहचान कैसे हुई इसको लेकर भी तमाम तरह की बातें होती रहती हैं। मादीपुर के इलाके में और इसके बाद सुल्तानपुरी बसने के बाद झुग्गी वालों के बीच सज्जन ने अपनी राजनीति धीरे धीरे खड़ी की। ज्वाला हेड़ी में उनकी चाय की दुकान होने की बात पुराने लोग बताते हैं। आज भी वहां उनकी कुमार स्वीट्स है।
1977 में उन्होंने निगम पार्षद का पहला चुनाव जीता और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। आपात्तकाल के बाद संजय गांधी का एक तरह से कांग्रेस पार्टी पर कब्जा था और सज्जन कुमार उनकी टोली के मेंबर थे।
नतीजा ये हुआ कि दिल्ली देहात में कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व सांसद चौधरी दलीप सिंह तमाम कोशिशों और भागदौड़ के बाद भी टिकट हासिल नहीं कर पाये और पार्षद सज्जन कुमार अपने आका संजय गांधी के दम पर लोकसभा चुनाव की टिकट पाकर मैदान में उतर गये। इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी के राज से खुद को ठगे से महसूस कर रहे लोगों ने सज्जन कुमार को आसानी से जीत थमा दी।
सज्जन जब सांसद बने तो वो दौर लगभग ईमानदारी का ही था। भ्रष्टाचार या पैसा कमाने की अंधी दौड़ नहीं थी। लेकिन कम पढ़े लिखे होने के बावजूद सज्जन पैसे की ताकत को बखूबी जानते थे।
उन्होंने अपना रसूख खड़ा किया, दिल्ली देहात में अवैध कालोनियां उनके कारिंदों ने काटनी शुरू की और सज्जन अपनी सत्ता की ताकत और काम अटके तो चांदी का टुकड़ा फेंकने के हुनर के बल पर बवाना, मंगोलपुर, नांगलोई, नजफगढ़, उत्तम नगर, पालम, महिपालपुर, महरौली, बदरपुर तक के इलाकों में कालोनियां खड़ी करते चले गए। इससे झुग्गियों की वोटों पर कब्जा जमाये बैठे सज्जन कुमार को कुकरमुत्ते की तरह उपजी कालोनियों में भी वोटों का जखीरा मिल गया।
पुराने दौर के कांग्रेसी बताते है कि दिल्ली के उपराज्यपाल रहते जगमोहन ने सज्जन के बहुत से अड़े हुए या फंसे हुए काम किए। 84 के सिख विरोधी दंगों से पहले सज्जन इस गुमान में थे कि जो चाहें वो कर सकते हैं, और ये सच भी था।
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब भीड़ का उन्माद चरम पर था तब सज्जन कुमार शायद कांग्रेस हाईकमान की नजरों में चढ़ने के लिए दंगों में लिप्त हो गये। शायद उन्होंने आगा पीछा सोचा नहीं था या ये सब सोचने का टाइम नहीं था।
उनके खिलाफ थानों में केस दर्ज हुए, लंबे मुकद्दमें चले पर सज्जन किसी न किसी कानूनी दांव पेंच और राजनीतिक तिड़कम से जेल जाने से बचते रहे। पंजाब में जब आतंकवाद चरम पर था तब भी वे ब्लैक कैट कामांडो के घेरे में खुलकर राजनीति करते रहे। ये कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि वे डर कर घर में नहीं दुबके, ना ही उन्होंने घबराहट पाली। उन पर उस दौरान एक हमला भी हुआ पर वे खुले घूमते रहे। यही वजह रही कि दिल्ली की राजनीति और कांग्रेस के भीतर फैले शह मात के खेल में वे ना केवल सक्रिय रहे बल्कि जीत भी हासिल करते रहे।
साहिब सिंह वर्मा 91 की हार को भूले नहीं थे। ये वो दौर था जब वर्मा दिल्ली के मुख्यमंत्री थे और वे सज्जन को हर हाल में लोकसभा चुनाव में पटकनी देना चाहते थे। साहिब सिंह ने 1996 के लोकसभा चुनाव में सज्जन का मुकाबला करने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कृष्ण लाल शर्मा को किसी तरह राजी कर लिया। कृष्ण लाल शर्मा बाहरी दिल्ली से बिलकुल अनजान थे। उम्मीदवार शर्मा जी थे पर चुनाव साहिब सिंह लड़ रहे थे। सज्जन कुमार बुरी तरह चुनाव हार गए। सज्जन के लिए ये तगड़ा झटका था। अभी उन्हें एक और पटकनी मिलनी बाकी थी।
2003 के विधानसभा चुनाव में शाहबाद दौलतपुर सीट पर सज्जन के भाई और विधायक रमेश कुमार मैदान में थे। साहिब सिंह ने अपने चेले कुलवंत राणा को टिकट दिलाई। सज्जन के लिए ये चुनाव नाक का सवाल था, उन्होंने ऐड़ी चोटी का जोर लगाया पर भाई को हार से नहीं बचा पाये।
और फिर वो समय भी आया जब ‘इंडिया साइनिंग’ था, अटल जी की अगुवाई में 2004 का लोकसभा चुनाव भाजपा पहले से ही जीतकर बैठी थी। लोकसभा चुनाव का बिगुल बजा तो बाहरी दिल्ली के दो शेर 91 की तरह फिर आमने सामने थे। दोनों तरफ के जोरदार चुनाव प्रचार के बीच चुनाव आये दिन रंग बदल रहा था। सज्जन और साहिब सिंह दोनों को ये पता था कि नतीजा कुछ भी हो सकता है। बवाना से बदरपुर तक की 21 विधानसभा सीटों पर फैली बाहरी दिल्ली लोकसभा सीट अपने आप में किसी अजूबे से कम नहीं थी। मतदान के दिन वोट पड़े और रिजल्ट का दिन आया। सज्जन कुमार करीब सवा दो लाख वोट से चुनाव जीत गए।
चुनाव प्रचार के दौरान एक पत्रकार वार्ता में सज्जन कुमार से पूछा गया था कि आपकी कभी साहिब सिंह वर्मा से मुलाकात होती है? उन्होंने हंसकर कहा था ‘पहलवान अखाड़ों में मिलते हैं।’
सज्जन कुमार कांग्रेस के भीतर शीला दीक्षित से भी खूब टकराये। 1998 में जब शीला को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया गया तो सज्जन खुश नहीं थे। वक्त के साथ शीला दीक्षित के साथ उनकी अदावत बढ़ती चली गई। नानावटी आयोग को लेकर भी कहा गया कि शीला दीक्षित ने सज्जन कुमार को निपटाने का बंदोबस्त किया था।
शीला तमाम कोशिशों के बावजूद दिल्ली देहात में सज्जन कुमार के वजूद को खत्म नहीं कर पायी। बवाना से महरौली बदरपुर तक ज्यादातर कांग्रेस विधायक और निगम पार्षद सज्जन कुमार की छत्रछाया में ही टिकट हासिल कर पाये और चुनाव जीत सके।
सज्जन कुमार अपनी राजनीति के शुरुआती दौर में ही मीडिया की ताकत को पहचान गए थे। वो अखबारों के दबदबे का कालखंड था। सज्जन ने दिल्ली के बड़े से बड़े और छोटे से छोटे अखबारों में अपनी पहुंच कायम की हुई थी। पत्रकारों को गिफ्ट देना, लंच और डिनर पर बुलाते रहना, संवाददाता के फोन पर सहज उपलब्ध हो जाना उनकी फितरत में था।
संपादकों से उनकी दोस्ती इस कदर रही कि सिखों के कत्लेआम में लिप्त होने के बावजूद अखबारों में उनके खिलाफ कोई मुहिम दिखाई नहीं पड़ी। मीडिया ट्रायल से वे मोटे तौर पर बचे रहे।
‘भाई साहब’ के संबोधन से अपने करीबियों और मतदाताओं में लोकप्रिय रहे सज्जन कुमार ने अपनी राजनीतिक ऊंचाई के समय ये सोचा भी नहीं होगा कि जेल के भीतर उनको आखिरी सांसें लेनी होंगी। वे खुद को अजेय मानते रहे और जब सांसद नहीं होते थे तो उनका रूतबा संसद के गलियारों में और अपने क्षेत्र की गलियों में सांसद से कम नहीं होता था। कई दशक तक वे हाई सिक्योरिटी घेरे में रहे, मंच से ठसक के साथ अपने ही अंदाज में भाषण देते रहे और दबंग लीडर होने के अपने वजूद को लोगों के बीच कायम किये रहे। मादीपुर में सुबह सुबह लगने वाले अपने दरबार में जब वे बैठते और अधिकारियों को फोन करते तो सांसद न होते हुए भी गुहार लेकर आये लोगों को यकीन रहता था कि ‘भाई साहब’ ने फोन कर दिया है, काम होकर रहेगा।
(नोट: वरिष्ठ पत्रकार आनंद राणा प्रेस कांउसिल ऑफ इंडिया के सदस्य रह चुके हैं। आप दिल्ली देहात के निवासी हैं।)
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