साधु-संत भी करते रहे हैं यह मांग
युवा तुर्क, लखनऊ
जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने बुधवार, 20 मई को एक बार फिर से गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा दिए जाने की बात दोहराई है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को इस पर कोई आपत्ति नहीं होगी, बल्कि उन्हें खुशी होगी कि इससे गाय के नाम पर होने वाली मॉब लिंचिंग और हिंसा की घटनाएं बंद हो जाएंगी।
मौलाना अरशद मदनी ने सवाल किया कि जब देश की बहुसंख्यक आबादी गाय को सिर्फ पवित्र ही नहीं मानती, बल्कि उसे ‘मां’ का दर्जा भी देती है तो फिर ऐसी क्या राजनीतिक मजबूरी है कि सरकार उसे राष्ट्रीय पशु घोषित करने से बच रही है?
मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यह मांग अनेक साधु-संत भी लंबे समय से उठा रहे हैं। इसके बावजूद, अगर सरकार इस विषय को गंभीरता से नहीं ले रही है, तो इसका क्या अर्थ निकाला जाए?
मौलाना मदनी ने कहा, ‘गाय के मुद्दे को एक राजनीतिक और भावनात्मक विषय बना दिया गया है. कुछ लोग योजनाबद्ध तरीके से गौकशी की अफवाह फैलाकर या पशु तस्करी के नाम पर निर्दोष लोगों को हिंसा का शिकार बना देते हैं।
दुख की बात यह है कि लगातार झूठ और अफवाहों के जरिए पूरे देश में मुसलमानों की छवि इस तरह खराब कर दी गई है कि समाज का एक बड़ा वर्ग मुसलमानों को गाय का विरोधी समझने लगा है। मॉब लिंचिंग की एक बड़ी वजह यही मानसिकता है।’
मौलाना मदनी ने कहा, ‘पहले बड़ी संख्या में मुसलमान गाय पालते थे और उससे दूध का व्यवसाय करते थे, लेकिन साल 2014 के बाद देश में जो नफरत का माहौल पैदा हुआ, उसके बाद मुसलमानों ने एहतियात बरतनी शुरू कर दी और अब अधिकांश लोग गाय की जगह भैंस पालना अधिक सुरक्षित समझते हैं।’
मौलाना मदनी ने कहा, ‘साल 2014 में मुंबई में आयोजित एक सम्मेलन में साधु-संतों और विभिन्न धर्मों के लोगों के साथ मिलकर देश में शांति और एकता कायम करने के उद्देश्य से गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित करने की मांग उठाई गई थी. जमीयत उलमा-ए-हिंद आजादी से पहले और आजादी के बाद भी लगातार मुसलमानों को यह सलाह देती रही है कि ऐसा कोई काम न किया जाए, जिससे दूसरे धर्मों के लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हों. इस्लाम इसकी अनुमति नहीं देता, बल्कि बहुधार्मिक समाज में आपसी सम्मान के साथ रहने की शिक्षा देता है।’
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