अनुज सिंह सचान, नई दिल्ली
भारत के इतिहास में कुछ महापुरुष ऐसे हुए हैं, जिन्होंने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्र निर्माण की मजबूत आधारशिला भी रखी। लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ऐसे ही असाधारण राष्ट्रनायक थे। 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाड़ में जन्मे सरदार पटेल को सामान्यतः 562 देशी रियासतों के एकीकरण के लिए याद किया जाता है।

किंतु उनके योगदान का व्यापक अध्ययन करें तो तीन महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ सामने आती हैं—
भारत का राजनीतिक एकीकरण, अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं का संरक्षण और किसानों की आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए सहकारिता को प्रोत्साहन।
राष्ट्रीय एकीकरण : लौह पुरुष की ऐतिहासिक उपलब्धि
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र तो हुआ, लेकिन देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलय एक बड़ी चुनौती थी। प्रथम उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री के रूप में सरदार पटेल ने वी.पी. मेनन के सहयोग से कूटनीति, संवाद और आवश्यकतानुसार कठोर निर्णयों के माध्यम से राष्ट्रीय एकीकरण को सफल बनाया।

जूनागढ़ और हैदराबाद जैसी जटिल परिस्थितियों में उनके दृढ़ नेतृत्व ने भारत की एकता को मजबूती प्रदान की। यही उनकी असाधारण निर्णय क्षमता थी, जिसने उन्हें लौह पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित किया।
- IAS और IPS : मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था की नींव
सरदार पटेल समझते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी स्थायी होगी, जब देश के पास सक्षम, निष्पक्ष और अनुशासित प्रशासनिक तंत्र होगा।
उन्होंने औपनिवेशिक प्रशासनिक व्यवस्था के स्थान पर स्वतंत्र भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) जैसी अखिल भारतीय सेवाओं के गठन और संरक्षण में निर्णायक भूमिका निभाई।
10 अक्टूबर 1949 को संविधान सभा में उन्होंने अधिकारियों को भय और पक्षपात से मुक्त होकर अपनी राय रखने की स्वतंत्रता देने का समर्थन किया।
उनका विश्वास था कि एक सक्षम अखिल भारतीय सेवा देश की एकता और प्रशासनिक स्थिरता के लिए अनिवार्य है। इसीलिए उन्हें भारतीय सिविल सेवाओं का संरक्षक भी कहा जाता है।
- किसान आंदोलन : बारडोली से राष्ट्रीय नेतृत्व तक
सरदार पटेल का किसानों से संबंध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि उनकी समस्याओं की गहरी समझ पर आधारित था।
1928 में गुजरात के बारडोली क्षेत्र में ब्रिटिश सरकार द्वारा भूमि राजस्व में की गई भारी वृद्धि के विरुद्ध उन्होंने किसानों को संगठित किया।
अनुशासित एवं अहिंसक सत्याग्रह के माध्यम से किसानों ने अन्यायपूर्ण कर वृद्धि का विरोध किया। आंदोलन की सफलता ने वल्लभभाई पटेल को राष्ट्रीय पहचान दिलाई और जनता ने उन्हें सम्मानपूर्वक ‘सरदार’ कहना प्रारंभ किया।
इस आंदोलन ने प्रमाणित किया कि संगठित किसान अन्यायपूर्ण व्यवस्था को बदलने की शक्ति रखते हैं।
- सहकारिता आंदोलन और अमूल की ऐतिहासिक शुरुआत
सरदार पटेल का मानना था कि किसानों को केवल उत्पादन तक सीमित रखने के बजाय उन्हें अपनी उपज के संग्रहण, प्रसंस्करण और विपणन का अधिकार भी मिलना चाहिए।
1940 के दशक में गुजरात के खेड़ा जिले के दुग्ध उत्पादक किसान निजी व्यापारियों और बिचौलियों के शोषण से परेशान थे। सरदार पटेल ने किसानों को अपनी सहकारी संस्था स्थापित करने की सलाह दी।
उनके मार्गदर्शन में मोरारजी देसाई ने किसानों को संगठित किया तथा त्रिभुवनदास पटेल के नेतृत्व में 14 दिसंबर 1946 को कैरा डिस्ट्रिक्ट को-ऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन की स्थापना हुई। यही संस्था आगे चलकर विश्वप्रसिद्ध अमूल (AMUL) बनी।
बाद में डॉ. वर्गीज कुरियन के तकनीकी एवं प्रबंधकीय नेतृत्व ने इस मॉडल को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की। अमूल ने भारतीय श्वेत क्रांति को मजबूत आधार दिया और किसान स्वामित्व वाले सफल व्यवसाय का उदाहरण प्रस्तुत किया।
- गन्ना किसानों एवं सहकारी चीनी उद्योग के लिए प्रासंगिकता
सरदार पटेल की सहकारिता संबंधी विचारधारा दुग्ध उत्पादन के अतिरिक्त गन्ना एवं अन्य कृषि आधारित उद्योगों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
गन्ना किसान केवल चीनी मिलों को कच्चा माल उपलब्ध कराने वाला उत्पादक न रहकर सहकारी व्यवस्था के माध्यम से उद्योग के स्वामित्व और प्रबंधन में भागीदार बन सकता है।
- आज के भारत के लिए उनकी विरासत
सरदार पटेल के राष्ट्र निर्माण संबंधी दृष्टिकोण में प्रशासनिक मजबूती और आर्थिक आत्मनिर्भरता एक-दूसरे के पूरक थे।
एक ओर उन्होंने अखिल भारतीय सेवाओं के माध्यम से मजबूत शासन व्यवस्था का समर्थन किया, वहीं दूसरी ओर सहकारिता के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने की दिशा दिखाई।
आज विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत और सहकारिता से समृद्धि जैसे लक्ष्यों के संदर्भ में उनकी विचारधारा विशेष महत्व रखती है।
सरदार पटेल को केवल रियासतों के एकीकरण तक सीमित करके देखना उनके विराट व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने देश को राजनीतिक एकता दी, प्रशासनिक व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान किया और किसानों को संगठित आर्थिक शक्ति बनने की प्रेरणा दी।
उनकी महान विरासत का सार है—एक राष्ट्र, सशक्त प्रशासन और समृद्ध किसान।
31 अक्टूबर को उनकी जन्म जयंती पर हम राष्ट्र निर्माण का संकल्प लें और दिल्ली में लौह पुरुष का स्मारक स्थापित हो, यही महापुरुष को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

(लेखक सहकारिता, पर्यावरण, स्वस्थ और औद्योगिक सुरक्षा के विशेषज्ञ हैं। आप त्रिवेणी शुगर इंडस्ट्री के सहायक महाप्रबंधक हैं)
